उत्तराखंड

सरोवर नगरी हुई भावुक: आशा भोसले के गीतों ने नैनीताल की वादियों को किया अमर

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नैनीताल: महान गायिका Asha Bhosle भले ही इस दुनिया को अलविदा कह गई हों, लेकिन उनकी आवाज़ में बसे गीत आज भी नैनीताल और उत्तराखंड की वादियों को जीवंत कर देते हैं। उनके कई सदाबहार गीतों ने सरोवर नगरी की खूबसूरती को परदे पर हमेशा के लिए अमर कर दिया।

फिल्म गुमराह का मशहूर गीत “इन हवाओं में, इन फिजाओं में…”, आदमी और इंसान का “जिंदगी के रंग कई रे…” और कटी पतंग से जुड़ा “मेरा नाम है शबनम…” जैसे गीत आज भी नैनीताल की झील, पहाड़ और वादियों की याद ताजा कर देते हैं। वहीं फिल्म बेटी का गीत “लहंगा मंगा दे मेरे बाबू आज नैनीताल से…” ने इस शहर को देशभर में नई पहचान दिलाई।

इतिहासकारों के अनुसार, रानीखेत में शूट हुई फिल्म दिल दे के देखो का लोकप्रिय गीत “यार चुलबुला है…” और 1972 की फिल्म हनीमून का “मेरे प्यासे मन की बहार…” भी कुमाऊं की खूबसूरती को संगीत के जरिए अमर कर गए। इन गीतों ने सिर्फ फिल्मों को नहीं, बल्कि नैनीताल-रानीखेत को हिंदी सिनेमा के रोमांटिक डेस्टिनेशन के रूप में स्थापित किया।

आशा ताई का उत्तराखंड की संस्कृति से भी गहरा लगाव था। वह कई बार यहां आने की इच्छा जता चुकी थीं। इतना ही नहीं, उन्होंने गढ़वाली फिल्म ‘ग्वेर छोरा’ के लिए भी अपनी आवाज़ दी थी। गीत “जनमो को साथ छे” आज भी पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा माना जाता है।

आशा भोसले के निधन के बाद नैनीताल में उनके गीतों को याद करते हुए लोग भावुक हैं। कहा जा रहा है कि जब-जब इन गीतों की धुन बजेगी, तब-तब नैनीताल की वादियों में आशा जी की आवाज़ गूंजती रहेगी।

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