बर्फ़ीली बदरीपुरी में तप का संकल्प: कपाट बंद होने के बाद 27 साधुओं ने मांगी हिमालय में रहने की अनुमति

हिमालय की शांत और रहस्यमयी कंदराओं में तपस्या की प्राचीन परंपरा आज भी जीवित है। भगवान बदरी विशाल के शीतकाल के लिए कपाट भले ही बंद हो चुके हों, लेकिन आस्था और साधना के द्वार अब भी खुले हैं। इस वर्ष देश के कई राज्यों और नेपाल से लगभग 27 साधु-संतों ने अनुरोध किया है कि उन्हें बदरीनाथ धाम में कठोर शीतकाल के दौरान रहकर तपस्या करने की अनुमति दी जाए।
शताब्दियों पुरानी परंपरा के अनुसार, कपाट बंद होने के बाद बदरीपुरी क्षेत्र में सामान्य जन प्रवेश वर्जित माना जाता है। स्कंदपुराण में वर्णित है—
“षड्मासं दैवतैः पूज्या, षड्मासं मानवैस्तथा”
अर्थात छह माह देवता स्वयं भगवान बदरी विशाल की पूजा करते हैं, और छह माह मनुष्य। मान्यता है कि कपाट बंद होने के बाद देवताओं के साथ नारद मुनि स्वयं साधु रूप में पूजा-अर्चना करते हैं।
अब बदला साधना का स्वरूप:
>पहले के दौर में साधु-संत केवल कंद-मूल और प्राकृतिक फलों पर निर्भर रहते थे, लेकिन अब हिमालय की कठिन परिस्थितियों को देखते हुए वे राशन, सूखे मेवे, गर्म वस्त्र, सोलर लाइट और आवश्यक सामग्री साथ रखते हैं।
>धाम में तापमान इन दिनों रात को माइनस 2 डिग्री पर पहुंच चुका है। दिसंबर के बाद यह माइनस 10 डिग्री तक गिर जाता है और कई बार 8 से 10 फीट तक बर्फ़ जमा हो जाती है। ऐसे माहौल में साधना करना साहस और कठोर तप का प्रतीक है।
सुरक्षा और तैयारी पर प्रशासन की निगरानी:
>उपजिलाधिकारी चंद्रशेखर वशिष्ठ ने बताया कि जिन साधुओं ने शीतकालीन प्रवास की अनुमति मांगी है, उनका पहले पुलिस सत्यापन कराया जाएगा। धाम में उनके ठहरने, सामान, सुरक्षा और मेडिकल जरूरतों का मूल्यांकन करने के बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
>इसके साथ ही बदरीनाथ क्षेत्र के होटलों की सुरक्षा के लिए 18 स्थानीय चौकीदारों ने भी अनुमति की मांग की है।
>शीतकाल के दौरान मंदिर परिसर की सुरक्षा आईटीबीपी की 23वीं बटालियन के 30 से अधिक जवान संभालेंगे।



