उत्तरकाशी: गोमुख और केदारताल क्षेत्र में बन रहीं छोटी झीलों से बढ़ी चिंता, नेपाल त्रासदी के बाद उठी निगरानी की मांग

उत्तरकाशी। नेपाल और तिब्बत में हालिया प्राकृतिक आपदा के बाद उत्तरकाशी के गोमुख और केदारताल क्षेत्र में ग्लेशियर के मलबे पर बन रही छोटी-छोटी झीलों को लेकर चिंता बढ़ गई है। गंगा और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों ने इन झीलों की निगरानी और गहन अध्ययन कराने की मांग की है।
गंगोत्री ग्लेशियर के गोमुख क्षेत्र और केदारताल के आसपास समुद्रतल से करीब 4,000 से 5,000 मीटर की ऊंचाई पर कई छोटी झीलें बनी हुई हैं। लगातार बारिश के कारण इनमें पानी की मात्रा बढ़ने की बात कही जा रही है। पर्यावरण से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि इन झीलों पर पानी का दबाव बढ़ता है तो यह क्षेत्र के लिए आपदा का कारण बन सकता है।
ग्लेशियर क्षेत्र पहले से संवेदनशील
पर्यावरणविद सुरेश भाई ने कहा कि गंगोत्री घाटी और ग्लेशियर क्षेत्र पहले से ही संवेदनशील हैं। उनका कहना है कि जिन ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पहले हल्की बारिश के दौरान बर्फबारी होती थी, वहां अब बारिश अधिक हो रही है। इससे ग्लेशियर के मलबे पर बनी झीलों में पानी बढ़ रहा है।
गंगा विचार मंच के प्रांत संयोजक लोकेंद्र बिष्ट और गोमुख से लौटे ग्राम प्रहरी प्रखर बिष्ट ने सरकार से इन झीलों का गहन वैज्ञानिक अध्ययन कराने की मांग की है। साथ ही इनकी नियमित निगरानी और जल्द से जल्द अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की आवश्यकता बताई है।
वैज्ञानिकों ने बताया अस्थायी झीलें
वहीं, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक मनीष मेहता के अनुसार, गोमुख और केदारताल क्षेत्र में बनी झीलें सुप्रा-ग्लेशियर झीलें हैं। इनमें से अधिकांश झीलें अस्थायी प्रकृति की होती हैं और सामान्य परिस्थितियों में इनसे बड़े खतरे की आशंका नहीं होती।
फिर भी, लगातार बदलते मौसम और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बारिश के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए इन झीलों की वैज्ञानिक निगरानी और समय-समय पर स्थिति का आकलन जरूरी माना जा रहा है।



