
बदरीनाथ धाम में भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना के दौरान शंखनाद नहीं किया जाता। जबकि सनातन परंपरा में शंख को भगवान विष्णु से विशेष रूप से जुड़ा माना जाता है। इसके पीछे हिमालय की प्राचीन धार्मिक मान्यताएं और एक पौराणिक कथा प्रचलित है।
मान्यता के अनुसार, जब अगस्त्य ऋषि ने राक्षसों का संहार किया तो आतापी और बातापी नाम के दो राक्षस वहां से भाग निकले। कहा जाता है कि आतापी मंदाकिनी नदी में छिप गया, जबकि बातापी बदरीनाथ धाम पहुंचकर एक शंख के भीतर छिप गया। इसी वजह से बदरीनाथ धाम में शंख बजाने की परंपरा नहीं है।
एक अन्य मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु ने शंखचूड़ नामक राक्षस का वध किया था। उस समय माता लक्ष्मी बदरीनाथ में तपस्या कर रही थीं। उनकी तपस्या में बाधा न पड़े, इसलिए भगवान विष्णु ने शंखनाद नहीं किया।
शंख न बजाने को लेकर एक पर्यावरणीय मान्यता भी सामने आती है। बदरीनाथ क्षेत्र लंबे समय तक बर्फ से ढका और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील रहता है। कुछ विशेषज्ञों ने शंख की तेज ध्वनि और क्षेत्र की प्राकृतिक परिस्थितियों को भी इस परंपरा से जोड़कर देखा है।
हालांकि, बदरीनाथ मंदिर के अंदर शंख बजाने की परंपरा नहीं है, लेकिन मंदिर परिसर के बाहर शंख बजाने पर प्रतिबंध नहीं है।



