उत्तराखंड

उत्तराखंड: न पहाड़ के झरने सुरक्षित, न मैदान का भूजल, विशेषज्ञों के शोध में पेयजल को लेकर बड़ा खुलासा

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देहरादून। उत्तराखंड में पानी की उपलब्धता के साथ अब उसकी गुणवत्ता भी चिंता का विषय बनती जा रही है। चार विशेषज्ञों के संयुक्त शोध में सामने आया है कि पहाड़ी क्षेत्रों के प्राकृतिक झरने जैविक प्रदूषण के खतरे से जूझ रहे हैं, जबकि मैदानी जिलों में भूजल की कठोरता और टीडीएस का स्तर कई जगह मानकों से अधिक पाया गया है।

वैज्ञानिक शोध पत्रिका डिस्कवर जियो साइंस में जुलाई में प्रकाशित अध्ययन में डॉ. परमजीत सिंह, डॉ. नितिन कुमार, डॉ. तेजराल और डॉ. सुरजीत मंडल ने उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों में जल गुणवत्ता का विश्लेषण किया। शोधकर्ताओं के मुताबिक, राज्य में पर्याप्त जल संसाधन होने के बावजूद कई पर्वतीय और ग्रामीण इलाकों में पेयजल संकट के साथ पानी की गुणवत्ता भी लगातार प्रभावित हो रही है।

कई मैदानी क्षेत्रों में बढ़ी पानी की कठोरता

शोध के अनुसार ऊधमसिंह नगर के महुआखेड़ागंज और काशीपुर क्षेत्र में भूजल का टीडीएस 603 मिलीग्राम प्रति लीटर दर्ज किया गया, जबकि स्वीकार्य सीमा 500 मिलीग्राम प्रति लीटर है। हरिद्वार के रोशनाबाद-सिडकुल क्षेत्र में टीडीएस 599 और कुल कठोरता 380 मिलीग्राम प्रति लीटर पाई गई।

हरिद्वार के सराय और ज्वालापुर क्षेत्र में पानी की कुल कठोरता 408 मिलीग्राम प्रति लीटर तक पहुंच गई। यह बीआईएस की सामान्य सीमा 200 मिलीग्राम प्रति लीटर से दोगुने से भी अधिक है। वहीं देहरादून में रिस्पना और बिंदाल नदियों के पानी में भी कठोरता 404 और टीडीएस 427 मिलीग्राम प्रति लीटर तक दर्ज किया गया।

पहाड़ी झरनों में कोलीफॉर्म बैक्टीरिया का खतरा

उत्तराखंड के पहाड़ी और ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी आबादी आज भी प्राकृतिक जलस्रोतों, जैसे धारा और नौला, पर निर्भर है। शोध में बताया गया है कि इन झरनों के पानी में कैल्शियम, मैग्नीशियम और पोटैशियम जैसे खनिज पाए जाते हैं, लेकिन अनियोजित शहरीकरण, बढ़ते पर्यटन और पर्याप्त स्वच्छता व्यवस्था नहीं होने के कारण इन स्रोतों में कोलीफॉर्म बैक्टीरिया का खतरा बढ़ रहा है।

शोध के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों के कई जलस्रोतों में सूक्ष्मजीवों की मौजूदगी भी पाई गई, जो स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकती है।

बस्तियों से गुजरते ही नदियों की गुणवत्ता में गिरावट

अध्ययन के मुताबिक हिमालयी चट्टानों के खनिजों और पानी के लंबे समय तक संपर्क के कारण टीडीएस, कुल कठोरता और क्लोराइड के बीच संबंध पाया गया है। अधिकांश स्थानों पर नाइट्रेट और फ्लोराइड का स्तर सुरक्षित मिला, लेकिन शहरी नालों और सीवेज के कारण नदियों में घुली ऑक्सीजन की मात्रा चिंता का विषय बनी हुई है।

गंगोत्री से निकलने वाली भागीरथी और बदरीनाथ के पास अलकनंदा के उद्गम क्षेत्र में टीडीएस 26 से 56 मिलीग्राम प्रति लीटर तक पाया गया। वहीं बस्तियों और शहरी क्षेत्रों से गुजरने के बाद पानी की गुणवत्ता में गिरावट दर्ज हुई। लक्सर की बांण गंगा नदी में टीडीएस 594 मिलीग्राम प्रति लीटर तक दर्ज किया गया।

विशेषज्ञों के शोध के अनुसार, उत्तराखंड में जल संकट केवल पानी की उपलब्धता तक सीमित नहीं है, बल्कि जलस्रोतों की गुणवत्ता को बनाए रखना भी बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

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