भारत की एथेनॉल नीति पर बढ़ी चिंता: ज्यादा पानी की खपत से जल सुरक्षा को खतरा

नई दिल्ली। भारत में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की नीति को जहां स्वच्छ ऊर्जा और आयात में कमी के समाधान के रूप में देखा जा रहा है, वहीं अब इसके पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर गंभीर चिंता जताई जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि एथेनॉल उत्पादन में अत्यधिक पानी की खपत देश की जल सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, एथेनॉल बनाने के लिए जिन फसलों का उपयोग किया जाता है—जैसे गन्ना, चावल और मक्का—वे अत्यधिक पानी की मांग करती हैं। अनुमान है कि एक लीटर एथेनॉल बनाने में करीब 10,000 लीटर तक पानी खर्च होता है, जो पहले से जल संकट झेल रहे भारत के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईंधन के लिए फसलों का बढ़ता उपयोग “फूड बनाम फ्यूल” की समस्या को भी बढ़ा सकता है। इससे कृषि भूमि का बड़ा हिस्सा ईंधन उत्पादन में लग सकता है, जिससे खाद्य सुरक्षा और कीमतों पर असर पड़ने की आशंका है।
सरकार का लक्ष्य एथेनॉल ब्लेंडिंग को बढ़ाकर पेट्रोल पर निर्भरता कम करना है, लेकिन इसके साथ जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव को लेकर नीति में संतुलन बनाने की जरूरत बताई जा रही है।



