चंपावत के च्यूरा खर्क में दिखा दुर्लभ रूफस बेलीड वुडपेकर, वन्यजीव प्रेमियों में खुशी

चंपावत जिले के च्यूरा खर्क गांव में दुर्लभ रूफस बेलीड वुडपेकर (कठफोड़वा) दिखाई देने से वन्यजीव प्रेमियों में खुशी है। सिर पर लाल रंग के ताज जैसी आकृति वाला यह पक्षी उत्तराखंड के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाया जाता है और इसे आसानी से देख पाना मुश्किल माना जाता है।
बांज और बुरांश के जंगलों में मिलता है यह पक्षी
विशेषज्ञों के अनुसार रूफस बेलीड वुडपेकर मुख्य रूप से बांज और बुरांश के जंगलों में पाया जाता है। पूरे हिमालयी क्षेत्र में इसकी मौजूदगी करीब 1,500 मीटर से 4,100-4,300 मीटर तक की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में दर्ज की गई है। उत्तराखंड में यह सामान्य तौर पर 1,500 से 3,000 मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों में देखा जाता है।
यह पक्षी नेपाल, भूटान, पाकिस्तान और उत्तर भारत से लेकर दक्षिण-पूर्वी चीन, म्यांमार, थाईलैंड और वियतनाम तक पाया जाता है। इतने बड़े क्षेत्र में मौजूदगी के बावजूद कई स्थानों पर यह अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है।
पेड़ों के रस पर निर्भरता
रूफस बेलीड वुडपेकर पेड़ों के तनों पर छोटे-छोटे छेदों की कतार बनाता है और बाद में उन्हीं छेदों से निकलने वाले रस को पीने के लिए बार-बार वहां लौटता है। इसके भोजन में पेड़ों का रस, चींटियां, भृंग, कैटरपिलर, टिड्डे, झींगुर, पतंगे और मकड़ियां शामिल हैं।
पिछले सप्ताह पूर्व सैनिक और काश्तकार अमित खर्कवाल ने अपने घर के पास इस दुर्लभ पक्षी को देखा था।
आवास पर मंडरा रहा पर्यावरणीय खतरा
अन्य कठफोड़वा प्रजातियों की तरह रूफस बेलीड वुडपेकर को भी कई पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। बांज के जंगलों का कम होना, वनों का खंडित होना, जंगल की आग, सड़क निर्माण और जलवायु परिवर्तन इसके प्राकृतिक आवास के लिए खतरा बन रहे हैं।
हालांकि फिलहाल इसे वैश्विक स्तर पर संकटग्रस्त प्रजाति नहीं माना जाता, लेकिन जिन क्षेत्रों में इसके पसंदीदा जंगल नष्ट हुए हैं, वहां यह अपने पुराने आवासों से गायब हो चुका है।



